बिहार के पटना जिले में शराब पकड़ने और जांच के नाम पर पुलिसिया छापेमारी के दौरान दो महादलितों की नदी में कूदने के कारण मौत हो गई।
घटना 4 अक्टूबर रविवार शाम की है जब पटना जिले के पिपरा थाना क्षेत्र अंतर्गत बेहरावा चकिया मुसहर टोली में शराब पकड़ने और जांच के नाम पर पुलिस द्वारा मुसहर समुदाय के लोगों पर बर्बर कार्रवाई की गई। पुलिस ने 32 महिलाओं समेत कुल 42 लोगों को जेल भेज दिया। छापेमारी के दौरान पुलिस के भय से 60 वर्षीय रामू मांझी और 16 वर्षीय किशोर आकाश मांझी पुनपुन नदी में कूद गये, जिसके बाद उनकी मौत की हो गई। आरोप है कि पुलिस ने दोनों को नदी से बाहर निकलने का मौका नहीं दिया, जिसके कारण दोनों की मौत हो गई।
इस पूरे मामले की स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा निष्पक्ष जांच कर दोषी पुलिसकर्मियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की जा रही है।
बेहरावा चक और इसके आस-पास के मुसहर टोली क्षेत्रों में पुलिस द्वारा की जाने वाली कार्रवाइयों को लेकर स्थानीय लोगों और प्रशासन के अलग-अलग पक्ष सामने आ रहे हैं।
स्थानीय निवासियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मुसहर समुदाय और उनके अधिकारों के लिए काम करने वाले मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि शराब पकड़ने के नाम पर की जाने वाली पुलिसिया कार्रवाइयों में अक्सर बर्बरता और मानवाधिकारों का उल्लंघन देखा जाता है। आरोप है कि पुलिस मुख्य तस्करों और बड़े सिंडिकेट पर हाथ डालने के बजाय अक्सर आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर महादलित बस्तियों (जैसे मुसहर टोली) को निशाना बनाती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि छापेमारी के दौरान महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार, मारपीट और घरों में तोड़फोड़ की घटनाएं होती हैं, जिससे समुदाय में भय का माहौल बनता है।
कई बार मामूली संदेह के आधार पर या बिना पुख्ता सबूत के भी बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में ले लिया जाता है, जिससे उनके जीवन और आजीविका पर गहरा संकट आ जाता है।
दूसरी ओर, पुलिस और स्थानीय प्रशासन इन कार्रवाइयों को बिहार में लागू कड़े मद्यनिषेध (शराबबंदी) कानून के तहत एक वैधानिक और आवश्यक प्रक्रिया बताते हैं।
आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, इन क्षेत्रों में गुप्त सूचनाओं के आधार पर छापेमारी की जाती है, जहां से बड़ी मात्रा में महुआ शराब, कच्चा माल और कई बार अवैध हथियार भी बरामद किए जाने के दावे किए जाते हैं।
प्रशासनिक अमला का तर्क है कि गिरफ्तारियां और जब्ती पूरी तरह से कानून के दायरे में की जाती हैं और इसका उद्देश्य किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि अवैध शराब के नेटवर्क को ध्वस्त करना है।
आरोप है कि पुलिस द्वारा महिलाओं के साथ बदसलूकी गई, उनकी साड़ी खींचने, जातिसूचक गालियां देने और गलत तरीके से छूने के गंभीर आरोप भी सामने आए हैं। यह पुलिसिया कार्रवाई सिर्फ दमनकारी ही नहीं, बल्कि महिलाओं और दलित समुदाय की गरिमा पर भी हमला है।
पुलिस ने इस कार्रवाई में कुल 42 लोगों को जेल भेजा है, जिनमें 32 महिलाएं हैं। इनमें कई युवा लड़कियां भी शामिल हैं। कई ऐसी महिलाओं को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है, जिनकी गोद में छोटे बच्चे और दुधमुंहे शिशु हैं। बच्चों से उनकी माताओं को अलग करना बेहद अमानवीय और संवेदनहीन कार्रवाई है।
इस पुलिसिया कार्रवाई के बाद ग्रामीणों से मिलने के बाद भाकपा माले की विधान परिषद सदस्य शशि यादव ने बताया कि मुसहर समुदाय बिहार के सबसे गरीब और वंचित समुदायों में से एक है। लंबे समय से इस समुदाय के अनेक परिवार शराब बनाने को अपनी जीविका का साधन बनाने के लिए मजबूर रहे हैं। शराबबंदी लागू होने के बाद से सरकार को इस समुदाय के परिवारों के लिए वैकल्पिक रोजगार और सम्मानजनक जीवन की व्यवस्था करनी चाहिए थी, लेकिन इसके बजाय लगातार पुलिसिया दमन किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि बिहार में भाजपा की सरकार है और सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री हैं। अपराध पर नियंत्रण करने में सरकार पूरी तरह विफल है। बलात्कारियों और हत्यारों को पकड़ने में पुलिस नाकाम है, शराब माफियाओं पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही है और अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। लेकिन गरीब मुसहर समुदाय की महिलाओं और नौजवानों को पकड़कर जेल भेजने में पुलिस पूरी ताकत लगा रही है।
शशि यादव साफ-साफ कहती हैं कि भाजपा सरकार की नीति साफ है—माफियाओं को संरक्षण और गरीबों पर दमन। उन्होंने कहा कि बेहरावा चकिया की घटना इसी दोहरे चरित्र को उजागर करती है।
उन्होंने मांग की है कि गिरफ्तार सभी निर्दोष लोगों को अविलंब रिहा किया जाए। 32 महिलाओं समेत गिरफ्तार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की निष्पक्ष समीक्षा की जाए। रामू मांझी और आकाश मांझी की मौत की न्यायिक/स्वतंत्र जांच कराई जाए। दोषी पुलिसकर्मियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए और मृतकों के परिजनों को उचित मुआवजा दिया जाए।
इसके अलावा महिलाओं के साथ बदसलूकी और जातिसूचक गाली-गलौज के आरोपों की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करने, छोटे बच्चों और दुधमुंहे शिशुओं की माताओं को जेल भेजने की कार्रवाई तत्काल वापस ली जाने और मुसहर समुदाय के परिवारों के लिए सम्मानजनक वैकल्पिक रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था किए जाने की भी माँग की गई है।
(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)